त्रंबकेश्वर (दीपक तिवारी)। महाराष्ट्र के नासिक जिले में है त्रियम्बक। जहां विराजे हैं आद्य ज्योतिर्लिंग त्रंबकेश्वर भगवान। यहां के ब्रह्म गिरि नामक पर्वत से दक्षिण भारत की गंगा गोदावरी नदी निकलती हैं है। इसी उद्गम-स्थान के पास स्थित हैं त्रयम्बकेश्वर-भगवान। इनकी अपार महिमा है।
पैराणिक कथा के अनुसार गौतम ऋषि तथा गोदावरी के आग्रह पर भगवान शिव ने इस स्थान में वास करने की बड़ी कृपा की और वे त्र्यम्बकेश्वर नाम से विख्यात हुए। मंदिर के अंदर एक छोटे से गड्ढे में तीन छोटे-छोटे लिंग है, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव- इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं। यहां काल सर्प दोष निवारण, पितृ दोष, त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए सालभर लाखों लोग पहुंचते हैं। कुशावर्त कुंड में स्नान कर लोग अपने को धन्य समझते हैं और आदिदेव त्रियम्बकेश्वर भगवान के दर्शन कर दुख दरिद्रता दूर करते हैं।
त्रियंबकेश्वर नाम से प्रसिद्ध यह स्थान भगवान शिव का निवास होने के कारण अत्यंत धार्मिक स्थल माना जाता है। यहां भगवान शिव स्वयं त्रंबकेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करते हैं। कुल 12 ज्योतिर्लिंग जिनमें सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओमकारेश्वर, केदारनाथ, भीमाशंकर, विश्वनाथ, बैद्यनाथ, नागेश्वर, रामेश्वर, घृष्णेश्वर शामिल हैं। जिसमें त्रंबकेश्वर अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण तथा द्वादश ज्योतिर्लिंग स्त्रोत में इस स्थान की महिमा का सुंदर वर्णन किया गया है।
पौराणिक तथा धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह स्थान महर्षि गौतम, गोरखनाथ तथा संत ज्ञानेश्वर से भी संबंधित रहा है। वर्तमान मंदिर पहले से मौजूद पुराने मंदिर की जगह पर तृतीय पेशवा बालाजी बाजीराव द्वारा बनाया गया था और उसके बाद 1789 में अहिल्याबाई होलकर द्वारा इसे दोबारा बनाया गया। मंदिर पत्थर से निर्मित आंगन के बीच स्थित है जिसके चारों ओर विशाल पत्थर से बनी चतुरप्रवेश दीवार है। इसके उत्तरी प्रवेश द्वार के ऊपर नगरखाना स्थित है। इस पूर्वामुख मंदिर की योजना तारानुमा है। स्थापत्य की दृष्टि से मौजूद विशेषताएं भूमिज शैली की ओर इशारा करते हैं।
गर्भ ग्रह के समक्ष एक विशाल वर्गाकार मंडप है और तीन दिशाओं में खुलने वाले दरवाजे हैं। दरवाजे के सामने अर्ध मंडप की योजना है जिसमें हर एक का शिखर अलग है। मुख्य मंडप पर सीढ़ी जैसे रचे हुए पत्थरों के खंड शिखर को पिरामिडनुमा आकार प्रदान करते हैं। यह मंदिर शैली की दृष्टि से भूमिज तथा स्थानीय मराठा वास्तुकला का कलात्मक मिश्रण है। मंदिर के बाहर स्थित चतुर्मुखी शिवलिंग के अतिरिक्त यहां अन्य कोई मूर्ति पेशवा पूर्व कालीन नहीं है पुरातत्व रूप से समृद्ध एवं अत्यंत धार्मिक महत्व के कारण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इस मंदिर को अधिसूचना के माध्यम से राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया है।