समन्वय से ही होगा मुसीबत का मुकाबला
भोपाल (देवदत्त दुबे)। इस समय पूरी दुनिया मुसीबतों से घिरी हुई है। देश में कोरोना मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। दूसरी तरफ बेरोजगारों की संख्या भी बढ़ रही है। लाखों मजदूर घरों को लौट कर आए हैं। ऐसे में सबसे बड़ी जरूरत इस समय समन्वय बनाने की है। केंद्र और राज्य सरकार के साथ-साथ परिवार के सदस्यों तक को समन्वय से ही इस मुसीबत का मुकाबला करना है। क्योंकि रहन सहन जीने के तरीके सभी में अब आमूलचूल परिवर्तन नजर आएगा।

दरअसल अलग अलग दलों की सरकार जब राज्य और केंद्र में होती है तब अनेक मुद्दों पर टकराव होता है। लेकिन इस समय कोरोना महामारी से मुकाबला करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार समन्वय बनाकर काम कर रही हैं। अधिकांश राज्यों ने प्रधानमंत्री से चर्चा के दौरान लॉक डाउन बढ़ाने की मांग की है। लेकिन अब लॉक डाउन शर्तों के साथ लागू किया जाएगा। जिसमें की धीरे-धीरे कामकाज भी शुरू हो सके। इसके लिए समझ और समन्वय जरूरी है। क्योंकि अलग अलग आवश्यकताएं हैं। गरीब जहां भोजन रोजगार चाह रहा है वही अमीरों को आर्थिक पैकेज और कारखाने दफ्तर शुरू करने की अनुमति चाहिए।

जिस तरह से लाखों मजदूर महानगरों से गांव की ओर लौटे हैं कुछ अभी भी लौट रहे हैं। उन्होंने जितने कष्ट झेले हैं उसके बाद अब वे महानगर की तरफ लौटने का साहस कब दिखा पाएंगे। कुछ कहा नहीं जा सकता। पिछले 1 महीने से सड़क पर मजदूर ही दिखाई दे रहे हैं। कुछ पैदल चल रहे हैं। तो कुछ हजारों किलोमीटर ऑटो रिक्शा जैसे वाहन में यात्रा कर रहे हैं। अब सरकार ने ट्रेन चलाना शुरु की है। लेकिन इसके बावजूद भी मजदूर सड़क पर चलने के लिए मजबूर हैं यदि सही समय पर सरकारों के बीच समन्वय  हो जाता तो शायद इतना अमानवीय कष्ट मजदूरों को नहीं झेलना पड़ता।

बहरहाल लॉक डाउन के चौथे चरण की तैयारियां जोरों पर हैं। जिसमें संक्रमण को रोकने की चुनौती भी होगी तो कारोबारी गतिविधियों को शुरू करने की जरूरत भी। ऐसे में प्रत्येक नागरिक को अपनी समझ और समन्वय से कठिन परिस्थितियों मुकाबला करना है।

संकट अनुमान से कहीं ज्यादा गहरा है। परिवार से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर अलग अलग समस्याएं हैं। महानगरों में काम करने वाले लाखो लोग घरों को लौटे हैं। यह लोग अब तक घरों को पैसे भेजते थे। अब खाली हाथ आए हैं। ऐसे में घर की मदद करने की बजाय घर में खर्चा बढ़ाएंगे। ऐसी स्थिति में परिवार वालों को यह ध्यान रखना है कि वर्षों से यह लोग परिवार का खर्चा चला रहे थे और भविष्य में फिर चलाएंगे। अभी इनके साथ समन्वय बनाकर चलें क्योंकि इनके पास वैसे भी रोजगार ना रहने का तनाव रहेगा। स्थानीय स्तर पर ऐसे रोजगारों का सृजन करना है जिससे कि ऐसे लोगों को रोजगार के लिए बाहर जाने की जरूरत ही ना पड़े। बल्कि गांव में छोटे-छोटे उत्पादन के केंद्र शुरू करना है जिसमें शुरू में जरूर दिक्कतें हो सकती हैं लेकिन बाद में सुविधा बढ़ जाएगी। अब परिवार के खर्चे भी कम हो गए कम आमदनी में भी परिवार का खर्चा चलाया जा सकता है। इसी तरह जनप्रतिनिधियों राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को भी रोजगार का सृजन करना प्राथमिकता में होना चाहिए तभी जाकर हम सब इस मुसीबत का मुकाबला कर पाएंगे। अन्यथा जब गांव में गरीबों को रोजगार नहीं मिलेगा खाने को नहीं मिलेगा। तब अमीर और गरीब के बीच खाई पैदा होगी। अपराध के बढ़ने की भी संभावनाएं बढ़ेंगी। जबकि यह अवसर है कि स्थानीय स्तर पर उत्पादन और रोजगार के नए केंद्र शुरू किए जाएं और इसके लिए पर्याप्त मात्रा में स्थानीय और राज्य स्तर पर समन्वय होना जरूरी है।